“आस”
दिल के ‘तहख़ाने’ से कुछ ‘सीली’सी तमन्नाओं को निकाल कर वक़्त के तार पर ‘सुखाया’ था हक़ीक़त की तेज ‘धूप’ ने उसे बेरंग कर दिया अब की ‘बारिश’ ख़ूब भिगोऊँगी उसे कुछ ‘गीली’ सी यादों के रंग भी भर दूँगी देखें तो.... इस बार की ‘गर्म’ हवायें कितना ‘सुखातीं’ है कितने रंग छोड़तीं है और कितने अपने संग ले जाती हैं । अनुपम